गुरुवार 5 मार्च 2026 - 10:23
भारतीय धार्मिक विद्वानों का परिचय | अल्लामा अदील अख़्तर

पेशकश: दनिश नामा ए इस्लाम, इन्टरनेशनल नूर माइक्रो फ़िल्म सेंटर दिल्ली

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, इस्लामी फ़िलॉसफ़र, उस्ताद-ए-वालिज़ीन अल्लामा सैयद अदील अख़्तर आबिदी सन 1315 हिजरी मुताबिक़ सन 1897 ईस्वी में सरज़मीने जहानाबाद, ज़िला जहानाबाद, सूबा बिहार में पैदा हुए। मौसुफ़ के वालिद “सैयद मुबारक अहमद आबिदी” अपने ज़माने की बुज़ुर्ग हस्तियों में शुमार किए जाते थे।

अल्लामा अपने दौर के बेमिसाल आलिम, फ़िलॉसफ़र, आरिफ़-ए-कामिल, मुसन्निफ़, मोअल्लिफ़, मुतरजिम, मुबल्लिग़, ख़तीब और मुदर्रिस थे। आपका सिलसिला-ए-नसब छब्बीस वसीलों से इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम तक पहुँचता है।

अल्लामा ने इब्तिदाई तालीम वतन ही में हासिल की, मगर पाँच बरस की उम्र में वालिद के इंतक़ाल के बाद वालिदा की सरपरस्ती में परवरिश पाई।

वालिद की वफ़ात के बाद मदरसा सुलेमानिया पटना में तालीम हासिल की, फिर जामिआ नाज़िमिया लखनऊ तशरीफ़ ले गए। वहाँ क़याम के दौरान नामवर असातिज़ा से क़सब-ए-फ़ैज़ किया और इल्म व फ़क़ाहत में बुलंद मक़ाम हासिल किया। इसी अरसे में इलाहाबाद बोर्ड, बिहार बोर्ड और पंजाब बोर्ड से इम्तिहान देकर मुख़्तलिफ़ असनाद हासिल कीं और जामिआ नाज़िमिया से “मुमताज़ुल अफ़ाज़िल” की सनद पाई। नज्मुल मिल्लत अल्लामा नज्मुल हसन ने आपको लिबास-ए-रूहानी यानी अबा और अमामा अता फ़रमाया।

आपके नुमायाँ असातिज़ा में मुतरजिम-ए-क़ुरआन अल्लामा फ़रमान अली और नज्मुल मिल्लत आयतुल्लाह नज्मुल हसन रज़वी शामिल हैं। अल्लामा ने तीन साल मदरसा-ए-वालिज़ीन में गुज़ारे और वहीं से बंगाल और बिहार के इलाक़ों में तब्लीगी सफ़र अंजाम दिए। आप इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में बहैसियते उस्ताद भी पहचाने गए।

अल्लामा के मुमताज़ शागिर्दों में ख़तीब-ए-आज़म अल्लामा ग़ुलाम अस्करी, अल्लामा नज्मुल हसन करारवी, शेर-ए-तब्लीग़ मौलाना शैख़ मुहम्मद हैदर, मौलाना सैयद काज़िम रज़ा, मौलाना सैयद अली आबिद करारवी और मौलाना सैयद शाकिर अमरोहवी शामिल हैं।

अल्लामा की एक नुमायाँ सिफ़त यह थी कि जिस इलाक़े में तब्लीग़ के लिए जाते, वहाँ की ज़बान सीख लेते थे। बंगाल में बंगाली ज़बान, मुनाज़रात के लिए हिंदी और संस्कृत ज़बान, और 1924 में अफ्रीका के तब्लीगी सफ़र के दौरान स्वाहिली ज़बान सीखी। अफ्रीका से वापसी पर सन 1926 से 1936 तक सूबा सरहद में तक़रीबन दस साल तब्लीगी ख़िदमात अंजाम दीं। इसके अलावा पेशावर में क़ाज़ी-ए-शहर और इमाम-ए-जुमा व जमाअत के मनसब पर भी फ़ायज़ रहे और “शबहा-ए-पेशावर”के तारीखी मुनाज़रे में हज़रत सुल्तानुल वालिज़ीन शीराज़ी के शाना-ब-शाना रहे, जिसका ज़िक्र “शबहा-ए-पेशावर” में तफ़सील के साथ मौजूद है।

अल्लामा ने अपनी ज़िंदगी को तब्लीग़-ए-दीन के लिए वक़्फ़ कर दिया था। मौसुफ़ पाराचिनार से अफ्रीका तक, तिब्बत से गुजरात, बंगाल, मुल्तान, कश्मीर, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और बल्तिस्तान तक मुसलसल सफ़र में रहे। उनके पुरअसर कलाम और ख़ुलूस भरे पैग़ाम ने बेशुमार दिलों को छुआ और बहुत से लोग मज़हब-ए-हक़ से आशना होकर दायरा-ए-शियअत में दाख़िल हुए।

सरहदी तब्लीग़ के बाद नज्मुल मिल्लत के हुक्म पर लखनऊ तशरीफ़ लाए और मदरसा-ए-वालिज़ीन के नायब मुदीर मुन्तख़ब हुए। सन 1355 हिजरी में आयतुल्लाह अबुल हसन उर्फ़ आगा मुन्नन की रिहलत के बाद आप मदरसे के मुदीर मुक़र्रर हुए। आपने अपने तरीक़े से मदरसे की तरक़्क़ी में अहम किरदार अदा किया और पच्चीस साल तक इस इदारे को कामयाबी के साथ आगे बढ़ाया।

अल्लामा अदील अख़्तर नज्मुल मिल्लत के क़रीबी और मुमताज़ शागिर्दों में शुमार होते थे। मौसूफ़ ने एक तवील अरसे तक जामिआ नाज़िमिया में दर्ज़ा-ए-फ़ाज़िल की तदरीस फ़रमाई। इस ख़िदमत के एतराफ़ में आयतुल्लाह नज्मुल हसन ने उन्हें कारकर्दगी की एक ख़ुसूसी सनद अता की, जिसे वह अपनी तमाम असनाद में सबसे बरतर समझते और उसे अपने इल्मी वक़ार का ताज-ए-सर क़रार देते थे।

मुआसिर उलमा आपके इल्म व तक़वा के मोतरिफ़ थे। अल्लामा की एक ख़ास इल्मी आदत यह थी कि जिस ज़बान में किताब होती, उसी ज़बान में उस पर हाशिया तहरीर करते थे।

आपने दीन-ए-इस्लाम की बेशुमार ख़िदमात अंजाम दीं, जिनमें मसाजिद की तामीर, तब्लीग़-ए-इस्लाम और इंसानों को राह-ए-हक़ से रोशनास कराना नुमायाँ तौर पर शामिल है।

मौसूफ़ एक बुलंद पाया मुसन्निफ़ भी थे। आपकी अहम तसानीफ़ में “तस्कीनुल फितन फ़ी सुल्हे हसन”, “तारीखे अहमदी”, “तदलीसे शिब्ली, “मसअला-ए-तक़य्या”, “दावतुन नज़र इला ख़िलाफ़ते ख़ैरुल बशर, “रिजाल-ए-फ़िक्र व नज़र”, “इल्मी ख़ियानतें” और “फ़लसफ़ा-ए-इस्लाम”शामिल हैं, जबकि सैकड़ों इल्मी व अदबी मज़ामीन मुख़्तलिफ़ मजल्लात में शाए हुए।

आपकी नस्ल में एक फ़रज़ंद मौलाना नासिर हुसैन आबिदी “फ़ख़रुल अफ़ाज़िल” हैं।

अल्लामा अदील अख़्तर ब्लड प्रेशर के मर्ज़ में मुब्तला थे। माह-ए-रमज़ानुल मुबारक में उनकी तबीयत बिगड़ने लगी और ब्लड प्रेशर हद से बढ़ गया। मुसलसल इलाज के बावजूद हालत संभल न सकी।

आख़िरकार यह इल्म व अमल का माहताब 8 शव्वाल 1370 हिजरी को ग़ुरूब हो गया। सोगवारों की आहों और सिसकियों के दरमियान उनका जनाज़ा उठाया गया और नमाज़-ए-जनाज़ा के बाद इमामबाड़ा गुफ़रानमआब में सुपुर्द-ए-ख़ाक कर दिया गया।

माखूज़ अज़:  मौलाना गाफिर रिजवी व मौलाना सैयद रज़ी ज़ैदी फंदेड़वी जिल्द-5 पेज-254 दानिशनामा ए इस्लाम इंटरनेशनल नूर माइक्रो फ़िल्म सेंटर, दिल्ली, 2024ईस्वी।  

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